रात में गाड़ी चलाते समय आँख में सामने से आने वाली गाडियो की लाइट चमक चका चौन्ध पैदा कर देती है क्या ये सब महँगी गाडियो में होता है ?
और सूरज के सामने देखने पर होने वाली चका चौन्ध को कैसे दूर करे या कम किआ जा सकता है तो विज्ञान में इसका भी इलाज़ है ... जी हां आज बात करते है 'पोलेरोइड' के बारे में ।
यानि प्रकाश को उसके दो घटको लंबवत और समान्तर घटको मेसे एक को प्रथक करने वाला यंत्र ।।
यानि अधुर्वित प्रकाश को धुर्वित प्रकाश में बदलने वाला सस्ता उपकरण आपके पास पोलेरोइड होता है ।
यह कुनैन का आयोडोसुल्फ़ेट या हरपेथाईट नाम का कार्बनिक योगिक के छोटे छोटे क्रिस्टल पर निट्रोसैल्युलोज़ के बोहोत पतली फ़िल्म यानि परत चढ़ा देते है जिससे सभी क्रिस्टल के प्रकाशिक अक्ष एक दिशा में यानि समान्तर आ जाये ये द्विवर्णता के गुण वाले क्रिस्टल होते है ये फ़िल्म कांच के दो प्लेटो के बिच में रख देते हैऔर ये पोलेरोइड तैयार हो जाता है ।
जब अध्रवित प्रकाश आता है तो उसमे लंबवत ओर समान्तर घटक दोनों होते है तो एक घटक जो समान्तर होता है वह तो जाने दिया जाता है बाकि धीरे धीरे अवशोषित हो जाता है और निर्गत प्रकाश समतल धुर्वित होता है और प्रकाश की तीव्रता भी कम हो जाती है यह आधी हो जाती है और चकाचोंध भी नही उत्पन्न करता है।।
इसका उपयोग गाडियो , धुप के चश्मो और 3d फिल्मो को बनाने और देखने के लिए किया जाता है ।
प्राचीन धरोहरों और मंदिरों का शिखर केसे बने जाने ---- प्राचीन काल के मंदिरों और राज प्रसादो को ऊंचे पहाड़ी शिखरों पर बना देखकर ऐसा लगता है की आखिर हमारे पूर्वजों के पास ऐसे क्या हुनर रहे होंगे की उन्होंने ऐसे महान कलाकृति बनाई है उसके उदाहरण है अंकोरवाट का मंदिर, राजा भोज मंदिर, मिस्त्र के पिरामिड,राजस्थान और दक्षिण भारत के आज से 1000 साल पुराने सभी मंदिर। जो बेसर शैली, द्रविड़ शैली और नागर शैली में निर्मित तो होते थे लेकिन उनके निर्माण में ऊंचे शिखरों और पहाड़ी पर निर्माण के समय पत्थर को पहुंचाना आखिर किस तरह होता होगा। तो दोस्तो पहले मंदिर और उसके निर्माण का डिजाइन बनाया जाता होगा जिससे क्षेत्र का अंदाजा हो जाए फिर वहा उच्च कारीगरों का दल बुलाया जाता होगा जो उस डिजाइन अनुरूप पत्थर और चट्टान समायोजन कर सके। मंदिर के पत्थरोको तराशकर हाथियो की सहायता से ऊपर शिखर तक पहुंचाया जाता होगा। जैसलमेर का किले का वीडियो youtube video लेकिन शिखर तक पहुंचने के लिए रैंप की निर्माण होता होगा जिसका ढाल बहुत कम रहता होगा जिससे इन रैम्प की लंबाई शिखर की ऊंचाई अनुसार बढ़ जाती होगी।...
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